शनिवार, 15 सितंबर 2007

तेरा चेहरा याद आया .....


"देखा चंदा को बदली से निकलते,
आज तेरा चेहरा याद आया...... ।

देखा पंतगों को शमां पर झूमते,

मिलन वो तेरा मेरा याद आया...... ।


मौसम था जो खुश, बहार थी चंचल,
कली को झूमते देखा, तेरा चेहरा याद आया...... ।



यूँ दर्द सह-सहकर मैं आदी हो गया ग़मों का,
मगर जाने क्यों मुझे तेरा दर्द याद आया..... ।।"

7 टिप्‍पणियां:

mahashakti ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर पक्तियॉं है खास कर अन्तिम जिसमें वास्तव में प्रेम झलक रहा है। कि प्रेमी के दर्द के ही मेरा दर्द है।

मगर जाने क्यों मुझे तेरा दर्द याद आया.....

vishal ने कहा…

bahut hi accha likha hai.
gam me bhi anand aa gaya.
akhiri line dilo ko choo gayi,ji ha mere pure parivar ke dilo ko.
aage bhi yu hi likhte rahe aur padhate rahe.
vishal

रंजू ने कहा…

मौसम था जो खुश, बहार थी चंचल,
कली को झूमते देखा, तेरा चेहरा याद आया......

bahut sundar likha hai .,badhaai

anni ने कहा…

patang bhi dard la sakti hai socha na tha...atyand sundar
malin means??/??

Sambhav ने कहा…

Bhaut hi Sunder Rachna............

Mere Pass Shabd Nahi Hai...aur kuch kahene ke liye
मगर जाने क्यों मुझे तेरा दर्द याद आया.....

sharad sharma ने कहा…

AAPKI ESH KAVITA NE DIL KO CHHU LIYA THANKS BHAI AAP KI KOSISH KO SALAM

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com