रविवार, 1 जुलाई 2007

चाहत के जंगल में...



"यादों की बस्ती, सपनों का आँगन,
शबनम की बिंदिया, कलियों के कंगन

यौवन की रिमझिम, महकी सी रातें,
ये तेरे लिये है, सारी सौगातें।

फूलों से सँवरी, शाखों की बाँहें,
महबूब का गाँव, रँगीन राहें ।

रिश्तों की मेंहदी, करती है बातें,
ख्वाबों का राजा, ले आया बारातें ।

मौसम की मदिरा, बारिश की हँसी,
गजरे की खूशबू, जूडे में फँसी ।

नटखट से बादल, पागल बरसातें,
चाहत के जंगल में लुकछिप मुलाकातें ।

ढलका सा आँचल, उनींदी निगाहें,
साँसों का मधुबन, हम हर रोज़ चाहें ।

हरियाली सुहागिन की, कैसी करामातें ,
पत्तों की झांझर पर नाची प्रभातें ।"

5 टिप्‍पणियां:

रंजू ने कहा…

wah bahut khoob ...

रिश्तों की मेंहदी, करती है बातें,

मौसम की मदिरा, बारिश की हँसी,

yah lines bahut hi khubsurat lagi:)

vishal ने कहा…

वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह.........
बस यही कहूँगा बार बार.
क्या खूब कहा है, एक अरसे बाद प्या पढने को मिला.

गिरिराज जोशी "कविराज" ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने मनुजी, बधाई स्वीकार करें।

Praveen Mishra ने कहा…

aree yaar har baar wahi comment de de k bore ho gaya hoon main...

lekin uske siva kychh likha bhi nahi jata na ...

so gr8 work....

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

बहुत ही रोंमांटिक, प्रेम की फ़ुहार में डूबी हुयी है यह रचना... सुन्दर बिम्ब व भाव भरी रचना