मंगलवार, 26 जून 2007

तेरे आँसू.....


"तेरी आँखों में
मोती थे छोटे छोटे
या थे तेरे आँसू
जो तेरे गालो से नीचे उतरकर
धीरे धीरे टपक रहे थे

लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰"

16 टिप्‍पणियां:

vishal ने कहा…

काफी बढिया कविता।
कम शब्दों मे बेहतर प्रस्तुति ।
धन्यवाद

deepak ने कहा…

लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰"

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखी है, मैने पहले ही कहा था कि समय के साथ-साथ निखार आयेगा, वो निखार अब स्पष्ट रूप से दिखायी देने लगा है ! अति सुन्दर

sunita (shanoo) ने कहा…

मनु पहले से अधिक भावप्रद रचना अच्छा लगा पढकर...

लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰"

अतिसुंदर अभिव्यक्ति है

शैलेश भारतवासी ने कहा…

अच्छी सोच है मियाँ

सिफ़र ने कहा…

मर्सिया किसी का भी हो, कैफ़ियत तो जनाब काबिलेतारीफ है । अच्छा रूपक बन पड़ा है;एक उदास सा रूपक। बड़ी भावप्रवण रचना थी और शब्दो के मायाजाल से खुद को आप बड़ी साफगोई से बचा ले गए। इसी तरह लिखते रहें ,यही शुभकामना है।

सस्नेह,

श्रवण

रंजू ने कहा…

wah wah .wonderful job ...bahut hi sundar ..sach mein padh ke maza aa gaya ..keep posting aur bataate rahe plz ...

azhar ने कहा…

hijr ka dard or apne vajood k mitne ka gum agar vo shabnam zamin par na girti or unhi phoolo me jazb ho kar reh jati to zyada achcha tha kunki unka girna unka hona zahir kar raha he or jahan me hun vahan prem nahi ho sakta

गौरव सोलंकी ने कहा…

लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰

बहुत दिल से लिखा है मनु भाई और दिल में उतर ही गया।

shrdh ने कहा…

Manu aapko pahli baar padha aur padhte hi laga ki wah aaj to kisi aise lekahk se mile hai jinse milna waqyi achha lagna tha

bahut pyaari baat ki aansun itne meethi bhi ho sakte hain aapki soch ki unnchayi ki daad deti hoon

Neha ने कहा…

Aapki panktiyon ne to nishabd kar diya!!:-O
Apne kuch purane din yaad aa gaye..
Bahut hi achcha likha hai aapne!!Awesome imagination!

Swati ने कहा…

Hmmmm
Bahut khoob Manuji,

aapki badi bahna ka chotasa tohfa aapke liye....

larajte the lab jab mere
bas teri yaadon se bezaar the...
ek katra jo noor barsi alsubah
Vo samjhe nahi,ki
wohi to mere
aansoo the!
naa kaho ki wo khaar the..

rajeev jain ने कहा…

वैसे तो न्यूज का आदमी हू| कविता कम समजता हू| लेकिन आपने कम शब्दों मे भावनाओ को बेहतर प्रस्तुति दी।
फट रहे है पुराने कागज़ ने विशेस प्रभावित किया|
धन्यवाद

Sambhav ने कहा…

Wah.....Wah........Very Nice....

"तेरी आँखों में
आँसू थे छोटे छोटे........

Such Pucho To Aaapne. unehe MOTI Kar Diya.......

सुनील डोगरा ज़ालिम ने कहा…

लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰"

जितनी तारीफ की जाए कम है। मालुम पडता है आप कविता गजलॊं के उस्ताद हैं जॊ कहीं दिपे बैठे हैं परन्तु पुष्प चाहे कितने ही घने पत्तॊं में छिपा हॊ सुगंध से आकर्षित कर ही लेता है।

Praveen Mishra ने कहा…

apni kavitaon me aap khud dikhai dete ho...
yahi aapki sabse badi khubi hai ....

gr8 ........

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

एक गीत याद आ गया
टुकडे हैं मेरे दिल के ऐ यार तेरे आंसू
बहने नही दूंगा मैं बेकार तेरे आंसू
कतरे नहीं छलके ये आंखों के प्यालो से
मोती हैं मुहब्बत के इन फ़ूल से गालों पे
पलकों पर सजा लूंगा ऐ यार तेरे आंसू