रविवार, 24 जून 2007

"रिमझिम बारिश गाँव में....."


कुछ दिनो पहले मानसून पूर्व की पहली बारिश के बाद गाँव में अपने खेतों की ओर जाना हुआ ।महसूस हुआ कि शहर और गाँव में बारिश की रुत कुछ भिन्न होती है .

कविता रात को ही लिखी है और किसी भी प्रकार की काँट-छाँट से मुक्त है। )


सागर से आँधी उठी
थम गयी आकर गाँव में ,
रिमझिम बारिश आ गई
बाँधें घुँघरू पाँव में ।

झोंके आगे निकल गये
पीछे रह गई रेत,
मौसम ने जब सरगम गाई
लहरा उठे सब खेत ।

धरती कहती फसलों से
कोई बात निराली,
समझकर मिट्टी की भाषा
झूम उठी हरियाली ।

जिन फूलों की हमने
चर्चा सुनी हर मुँह,
गिरते-गिरते छोड गये
भीनी-भीनी खुशबू ।

पुराने पेड टूट रहे
यह कैसी रीत चली,
ऐसी रुत मे क्या बोलें
यारों चुप्पी भली ।

आँधियां आती जाती है
बदल बदल कर भेस,
फिर भी जीवित रहता है
मेरा यह गाँव, यह देस ।

11 टिप्‍पणियां:

deepak ने कहा…

outstanding poetry. bahut hi saral shabdo mei apni baat kah dee. bahut badiyaa dost.

गिरिराज जोशी "कविराज" ने कहा…

वाह!

मानसून के आगमन का खेतों में स्वागत!!! सचमुच दिल स्वत: गुनगुनाने लगता है, शब्दों में खुशी झलकने लगती है....

आपने बहुत ही खूबसूरत लिखा है, बधाई स्वीकार करें।

सस्नेह,

गिरिराज जोशी "कविराज"

vishal ने कहा…

मानसून का इतना सुन्दर वर्णन, जिसमे बहुत ही सरल शब्दों मे कुछ गूढ बातें भी कही गई है ।
कविराज से पूर्ण समर्थित ।
मेरी भी बधाई स्वीकार करें ।

Hari ने कहा…

Giriraj ji aur Vishal ne mere maan ki baat kahi hai, aab aage kuch bhi kehne ke liye mere pass shabd nahi hai, mere aur se aapko bahut bahut subhkamnaye.
Maheshwari Hari Taparia
09336432145

गौरव सोलंकी ने कहा…

मिट्टी की खुशबू तो बहुत सोंधी आई आर्य मनु जी...
गाँव जाने का मन भी होने लगा. अच्छा लिखा है आपने।
वैसे एक उड़ता सा खयाल आया कि आप शायद गद्य भी अच्छा लिखते होंगे।यूं ही आया पर कारण समझ नहीं आया इस विचार के आने का।
कुच पढ़वाइये कभी...

Neha ने कहा…

arya manu ji....
baarish ka varnan karte karte zindagi ki ek badi sachchai aapne saral shabdon mein hamare saamne rakh di...:-D
sach mein gaon ja k ...khet mein khade ho kar bheegne ka mann kar diya!!!!
bahut achcha likha hai aapne!

Swati ने कहा…

bahut sundar likha hai Manu ji aapne...mere apne des me is waqt kheto me buaayi ki taiyaari chal rahi hogi...Vidarbha ke kisaan halaanki is sundar geet ke mohtaaz ho gaye hain lekin, har kisaan ki tarah barkha raani ke barasne ki aas hum bhi liye baithe hain...

Sundar!

रंजू ने कहा…

bahut hu sundar .har line dil ko chu gayi ....

शैलेश भारतवासी ने कहा…

सबसे बढ़िया बात इस कविता की है कि इसके सारे पद गेय हैं। सम्भव हो तो अपनी आवाज़ में रिकार्ड करके हमें भेजें। सच में मज़ा आ जायेगा। वाल्मीकि रामायण में ऋतुओं का वर्णन बहुत ही सुंदर मिलता है, मैं आपकी इस कविता में वही तत्व ढूँढ रहा था, कुछ हद तक सफल भी हुआ। मुझे भी अपने गाँव की बारिश याद आ गई।

Lakshmi Narayan ने कहा…

ati uttam, bahut hi saral aur sundar rachna hai.
पुराने पेड टूट रहे
यह कैसी रीत चली,
ऐसी रुत मे क्या बोलें
यारों चुप्पी भली ।
ye panktiyan thodi si aahat karti hain...........
आँधियां आती जाती है
बदल बदल कर भेस,
फिर भी जीवित रहता है
मेरा यह गाँव, यह देस ।
wahin uprokt panktiyan ek naye sahas ka sanchar. ye virodhabhas khoda sa khalta hai.
parantu anttah dil se ek hi baat nakalti hai..... ati uttam, ati uttam.

sunita (shanoo) ने कहा…

वाह मनु श्रेष्ठ रचना है हर पक्तिं पर दिल कहत है वाह वाह वाह
गाँव की माटी की सौंधी खुशबू जैसे की रचना में बस गई है जो बारिश के बाद चारो दिशाओं फ़ैल जाती है... और अन्त में लगा एक संदेश दे रही कविता...

आँधियां आती जाती है
बदल बदल कर भेस,
फिर भी जीवित रहता है
मेरा यह गाँव, यह देस ।
शानू