
मुन्तज़िर है तुम्हारी राहों में,
बसे हो जबसे इन निगाहों में ।
कहीं भी रहो, कहीं भी जाओ तुम,
दिखेगें तुमको अश्क और आहों में ।
ज़ज़्बाते-उल्फत क्या बतायें
तेरी याद बितायेंगें आहों में॰॰॰॰।
बसे हो जबसे इन निगाहों में ।
कहीं भी रहो, कहीं भी जाओ तुम,
दिखेगें तुमको अश्क और आहों में ।
ज़ज़्बाते-उल्फत क्या बतायें
तेरी याद बितायेंगें आहों में॰॰॰॰।
1 टिप्पणी:
तुम कहो ना कहो तुम्हारी रचना कहे जा रही है..मनु तुम्हे तो इश्क हो गया है...मगर कौन है वो खुशनसीब...हम भी तो जाने...
तुम्हारी दीदी
शानू
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