
"तेरी आँखों में
मोती थे छोटे छोटे
या थे तेरे आँसू
जो तेरे गालो से नीचे उतरकर
धीरे धीरे टपक रहे थे
लेकिन मुझे तो ऐसा लगा
जैसे किसी फूल पर
रात भर अटकी शबनम के
लरजते, तड़पते चंद क़तरे
सुबह के सूरज की
तपिश मे गरम होकर
सहमे-सहमें और डरे से
ज़मीं पर गिर रहे थे॰॰॰॰॰"